Tuesday, 11 September 2012

सबकुछ तुम ही थे

अगर हम न रहे जिंदगी में तुम्हारी तो हमें याद कर लेना तुम,
सोच कर कोई बात हमारी आँखें नम न कर लेना तुम,
एहसास हमारा है साथ तुम्हारे हो सके तो महसूस कर लेना तुम,
चाहो जो हमसे बात करना तो आँखें बंद कर लेना तुम,
याद ही है जो मिटटी नही बस इस याद को जिंदा रखना तुम,
इस जनम तो मिलना मुमकिन नही बस आस को जिंदा रखना तुम,
जा रहे हैं तुम्हारी चौखट से पर गलत हमें न समझना तुम,
खुशियाँ मुबारक हो तुमको ग़म अपने मुझे दे देना तुम,
अपनी मज़बूरी से हुई मजबूर वरना मेरे तो सबकुछ ही थे तुम...

Friday, 29 June 2012

वस्ल


मासूम मेरी हसरतों ने सिर्फ इतना तकाज़ा किया,
हम ने ऐतबार उन पे कुछ ज्यादा किया,
दिल तब भी बेकरार था दिल आज भी बेताब है,
तुने इस दिल को शर्मसार इतना ज्यादा किया,
वक्त की आंधी ने हमें कहाँ से कहाँ पहुंचा दिया,
पलट के भी न देखा इस कदर दिल को बहला लिया,
अब के जो बिछड़े तो फिर कभी न मिल सकेंगे,
ज़िन्दगी में मुसाफिर हैं अपनी अपनी राह चल देंगे,
आओ के इस तरह से जुदा हो सकें हम,
पिछले सारे रंज-ओ-गम को भुला सकें हम,
आओ के इस वस्ल को इतना हसीं बनायें,
हर गम इस के सामने अदना सा हो जाये,
न हो कोई मलाल न हो कोई शिकवा,
इस पहचाने हुए रिश्ते को इस तरह अनजान बनाये....

Monday, 28 May 2012

तू...........

हर घडी हर कदम मेरे साथ है तू,
दिल की हर एक धड़कन की आवाज़ है तू,
सर्दी की गुनगुनी धूप का एहसास है तू,
गर्मी की ठंडी छाँव का अंजाम है तू,
पेड़ के पके फल की मिठास है तू,
नदी के बहते पानी की सुरीली आवाज़ है तू,
ज़िन्दगी की किताब पे लिखा सुनहरा अलफ़ाज़ है तू,
मेरे होंठों की हर दुआ का आग़ाज़ है तू,
कुछ भी नही तो फिर क्यूँ ख़ास है तू,
मेरे दिल का एक किस्सा-ए-दास्ताँ है तू........

Saturday, 10 March 2012

एक पूरी सांस

हमने हमारे दरमियां
एक दायरा सा बना रखा है
कसक का, खलिश का
इस दायरे के बीच 
न हवा का गुजर है
न रोशनी का दखल
अगर कुछ है तो बस 
एक स्याह जाल है तन्हाई का
कि जिसमें हम तुम
बहुत करीब होकर भी
बहुत दूर हैं एक दूसरे से

मेरी मासूम सी ख्वाहिशें
मेरे ख्वाबों के बगीचे
और नर्म-नाज़ुक सी
मेरी सुबहें, मेरी शामें
ऐसे चुरा ली है तुमने
जैसे गुलशन से
एक फूल चुरा लेता है कोई

ये फ़िज़ायें, ये हवाएं
ये रौनक, ये बहारां
और ये महफ़िल -ए-मुनव्वरां
सबकुछ है यहां मगर
हमारी एक खलिश ने
बिखरा दिया है इनका वजूद

अब आओ
के इस दायरे को तोड़ दें हम
स्याह जाल को काट दें हम
मैं तेरे सारे दर्द पी जाऊं
और तुम मेरे सारे ग़म को जी जाओ

अब आओ के
अधूरी सांस लिए हम 
ज़िंदा रह तो सकते हैं
मगर जी नहीं सकते सच्ची
अब आओ के
सारे दायरे तोड़ दें हम
तो हमें एक पूरी सांस मिले सच्ची...

- ग़ज़ाला हाशमी

Monday, 6 February 2012

तेरी आवाज़


हज़ारों किस्म की आवाजों से भरी है ये दुनिया,
नहीं सुनायी देती वो सिर्फ तेरी आवाज़ है,
तनहाई में भी जिसे सुन के हो महफ़िल का अहसास,
दूर होते हुए भी जिसे सुन के हो तेरे पास होने का अहसास,
नहीं सुनायी देती वो सिर्फ तेरी आवाज़ है,
दिल मायूस होता मेरा तो तू याद करता था फ़ौरन,
अपनी आवाज़ की कशिश से बोझ दिल का हल्का करता था फ़ौरन,
नहीं सुनाई देती वो सिर्फ तेरी आवाज़ है,
अर्श से फर्श तक कोई शय नहीं ऐसे,
जिससे मिसाल दी जा सके तेरी आवाज़ की,
नहीं सुनाई देती वो सिर्फ तेरी आवाज़ है,
हालात कुछ इस तरह से बदल गए,
न तू रहा न तेरी आवाज़ की कशिश ही रही,
दुनिया के शोर-ओ-गुल से मुझे क्या वास्ता,
सिर्फ तेरी ही आवाज़ सुनने की मुझे है तमन्ना,
नहीं सुनाई देती वो सिर्फ तेरी आवाज़ है...

Tuesday, 24 January 2012

एक दुआ...

यूँ तो कहने को है बहुत कुछ,
लेकिन समझ नहीं आता क्या कहूँ,
गुफ्तगू करने की है आरज़ू मुझे,
पूछना चाहती हूँ तुझसे सवाल कई,
हर एक चेहरे पे कई चेहरे हैं नकली,
क्यूँ सूरत नहीं दिखाई देती है आदम की असली,
क्यूँ फरेब से भरी पड़ी है दुनिया सारी
क्यूँ इंसानियत पे हैवानियत है भारी,
क्यूँ जज़्बात का समंदर थम सा गया है,
क्यूँ एहसास का पानी खुश्क हो गया है,
क्या यही वो  मखलूक है जिसे इतने प्यार से तुने बनायीं है,
अगर हाँ तो मेरे लिए ये पराई है,
या तो मुझे बना दे औरों जैसा,
या फिर हटा ले मेरी तकदीर से नाम जिंदगी का,
या रब कुछ तो जलवा दिखा अपना,
जो सुधार दे लोगों का रवैया,
खुदाया दुआओं में हो इतना असर मेरी,
बदल जाए लोगों का दिल अभी के अभी,
बदल जाए लोगों का दिल अभी के अभी......

Friday, 20 January 2012

सोच के बीच

ज़िन्दगी की राहें जुदा सी हो गयीं,
तू वहां रह गया मैं यहाँ खो गयी,
पलट के देख न सकी मैं तुझको,
और तू समझा मैं बेवफा हो गयी,
ऐतबार होता तो आते मेरे गरीबखाने में,
कुछ अपनी कहते 
कुछ मेरी सुनते करीने से,
पर तुझे ज़माने की कद्र है मेरी नहीं,
इस बात का एहसास मुझे है 
लेकिन तुझे नहीं,
मैं समझती हूँ रिश्ते निभाने के लिए 
होती है ज़रूरत सलीके की,
और तू सोचता है
रिश्ते निभाने ज़रूरत ही नहीं,
कितना फर्क है 
तेरी और मेरी सोच के बीच,
इसलिए तो शायद 
कोई ताल्लुक न रह गया हम दोनों के बीच,
फिर भी तू खुश है 
तो मेरे लिए इतना ही है काफी,
खुदा हर ख़ुशी से नवाजे तुझे
यही दुआ है मेरी...


Saturday, 14 January 2012

रात का चाँद

रात का चाँद बहुत ही ख़ास लगा,

तू दूर था फिर भी आस-पास लगा,


तेरी मौजूदगी के अहसास से मिट गयीं मेरी तन्हाईयाँ,


इस बात का तुझे अहसास हो ऐसे मेरी किस्मत कहाँ,


रातभर तुझे मैं सोचती रही मुसलसल,


तू नींद के आगोश में करवटें बदलता रहा मुसलसल,


तेरी याद से मेरी आँखें हुई थी नम,


तेरे अहसास से खुशनुमा हुआ था मेरा मन,


तेरी फ़िक्र करती हूँ मैं हर कदम,


पर फर्क तुझे कहाँ पड़ता है मेरे हमदम,


मेरी सोच का दायरा तो बस तुझसे शुरू और तुझी पे ख़त्म,


लेकिन ये अहसास है मुझसे भी आगे तेरे लिए एक ज़माना है हमदम....






Tuesday, 3 January 2012

कुछ बात करो


दूर सुनसान-से साहिल के क़रीब
एक जवाँ पेड़ के पास
उम्र के दर्द लिए वक़्त मटियाला दोशाला ओढ़े
बूढ़ा-सा पाम का इक पेड़, खड़ा है कब से
सैकड़ों सालों की तन्हाई के बद
झुक के कहता है जवाँ पेड़ से... ’यार!
तन्हाई है ! कुछ बात करो !’